सुतोल से शिलासमुद्र- होमकुण्ड। बुग्याल बचाओं अभियान

CPBCED

 

बुग्याल बचाओं अभियान के तहत नन्दादेवी राजजात यात्रा के उच्च हिमालयी इलाकों एवं बुग्यालों के अध्ययन के लिए गए सुतोल-चन्दनियाघट अध्ययन भ्रमण की संक्षिप्त रिपोर्ट।

सी.पी.भट्ट पर्यावरण एवं विकास केन्द्र गोपेश्वर की ओर से नन्दादेवी राजजात 2014 के यात्रा मार्ग के उच्च  हिमालय क्षेत्रों में राजजात 2014 के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए बुग्याल बचाओं अभियान के तहत 4 जुलाई 2015 से 7 जुलाई 2015 के बीच अध्ययन भ्रमण एवं जागरूकता अभियान संचालित किया गया।
केन्द्र द्वारा यह अभियान पिछले साल सितम्बर माह में राजजात मार्ग के अंितम गांव वाण से बेदनी बुग्याल के बीच किए गए इसी तरह के अध्ययन अभियान में तय किए गए कार्यक्रम के तहत किया गया। बुग्याल बचाओं अभियान के तहत राजजात मार्ग पर बुग्यालों के संरक्षण के लिए जनजागरूकता लाने की यह दूसरी श्रृखला का एक हिस्सा था। पूर्व की भांती इस बार भी अभियान में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, छात्र, गुरूजनों तथा विज्ञानियों के अलावा बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामवाशियों ने भाग लिया। शिक्षाविद्व श्री गंभीर सिंह फरस्वाण के नेतृत्व में अभियान संचालित हुआ। चमोली जिले के घाट विकास खण्ड के अन्तवर्ती ग्राम सभा सभा पेरी से अभियानद ल ने अपनी बुग्याल बचाओं रैली निकाली। सुतोल गांव तक रैली निकाली गई। बुग्यालो तथा वनों के संरक्षण को लेकर बनाये गए नारों के साथ अभियान दल पदयात्रा करता हुआ देर सांय नन्दाकिनी के जलागम के अंतिम गांव सुतोल पहुंचा। सुतोल गांव से 5 जुलाई बुग्याल बचाओं अभियान की मुख्य यात्रा शुरू हुई। सुतोल, तातड़ा गांवों से होते हुए दल साम को राजजात यात्रा मार्ग के प्रमुख पड़ाव लाताखोपरी पहुंचा। दूसरे दिन अध्ययन भ्रमण एवं बुग्याल तथा वन क्षेत्र में सांकेतिक साफ-सफाई के कार्यक्रम को अंजाम देने के लिए दल को तीन हिस्सों में जिम्मेदारी सौपी गई। पहला दल लाताखोपरी, दूसरा दल जामुनडाली व भुज्याणी इलाके में तथा तीसरा दल चन्दनियाघट पड़ाव तथा उसके आसपास के इलाके में गया।

दल ने उच्च हिमालयी क्षेत्र में दो दिनों में तातड़ा से चन्दनियाघट तक राजजात मार्ग के आसपास बिखरे प्लास्टिक-पौलीथीन तथा अजैविक कबाड़ को एकत्रित किया। इस इलाके में वनस्पति, वन्यजीवन एवं वनों पर राजजात यात्रा के प्रभावों को समझने की कोशिश भी की। चन्दनियाघट से सुतोल गांव के स्त्री पुरूषों के साथ मिलकर प्लास्टिक, पौलीथीन के कचरे को भी एकत्रित किया गया। दल ने इस एकत्रित किए गए अजैविक कुड़े को खच्चरों के जरिये सितेल गांव तक ले गए जहां से जीप के माध्यम से चमोली नगरपालिका परिषद द्वारा संचालित कचरा निस्तारण केन्द्र में जमा किया गया।
इस बार मुख्य दल में निम्न सदस्य शामिल थेः-
1. श्री गम्भीर सिंह फरस्वाण, शिक्षक एवं गायत्री परिवार शांतिकुज से संबंध
2. डा. शिव चन्द्र सिंह रावत, प्रोफेसर, इतिहास विभाग रा.महा.विद्यालय गोपेश्वर
3. श्री मंगला कोठियाल, न्यासी, सीपीबी पर्यावरण एवं विकास केन्द्र गोपेश्वर
4. श्री रधुवीर सिंह बर्त्वाल शिक्षक एवं समन्वयक कोठियाल सैंण गोपेश्वर
5. श्री गौरव बशिष्ट नई दिल्ली
6. श्री बीर सिंह रावत , वन आरक्षी बदरीनाथ वन प्रभाग गोपेश्वर
7. श्री खिलाफ सिंह नेगी ग्राम आला घाट चमोली
8. श्री मुकेश राम सह सचिव राज. स्ना. महाविद्यालय गोपेश्वर
9. श्री बीरेन्द्र सिंह ग्राम ल्वाड़ी घाट
10. श्री गजेन्द्र सिंह राजकीय स्ना. महा. गोपेश्वर
11. श्री प्रकाश नेगी राजकीय स्ना. महा. विद्यालय गोपेश्वर
12. श्री महिपाल सिंह नेगी राजकीय स्ना.महा.विद्यालय गोपेश्वर
13. श्री रधुबीर सिंह नेगी एच.एन.बी. गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर
14. श्री ओमप्रकाश भट्ट, प्रंबंध न्यासी, सीपीबी पर्यावरण एवं विकास केन्द्र गोपेश्वर
इन सदस्यों के अलावा चन्दनियाघट में सुतोल गांव के
1. श्री अजुर्न सिंह
2. श्री भाग सिंह
3. श्री सुरेन्द्र सिंह
4. श्री राजेन्द्र सिंह
5. श्री रधुबीर सिंह
6. श्री गब्बर सिंह
7. श्री पूरण सिंह
8. श्रीमती सीता देवी
9. श्री पुष्कर सिंह
10. श्री कलम सिंह
11. श्री धन सिंह
12. श्री धीरज सिंह
13. श्रीमती मथुरा देवी
आदि भी शामिल हुई।

अभियान दल की ओर से वापसी में 7 जुलाई को सुतोल गांव में सुतोल गांव की वन पंचायत के सरपंच श्री भजन सिंह की अध्यक्षता में बुग्यालों तथा वनों के संरक्षण को लेकर ग्राम संगठनों के पदाधिकारियों, ग्रामवाशियों, स्कूली बच्चों तथा स्थानीय शिक्षकों एवं ग्रामस्तरीय कर्मचारियों की मौजूदगी में जनजागरण के लिए आम सभा भी आयोजित की गई। इसमें बुंग्यालों की वर्तमान हालात तथा इनके संरक्षण के स्थानीय स्तर पर हो रहे प्रयासों तथा संरक्षण के लिए बेहतर रणनीति पर पर विमर्श हुआ। खासतौर पर बुग्यालों में अजैविक कचरे के प्रबंधन के लिए परम्परा विकसित करने के लिए सटीक एवं प्रभावी प्रयास कैसे हों? इन पर चर्चा हुई।

अभियान दल के सदस्यों ने पेरी से लेकर चन्दनियाघट तथा चन्दनियाघट से लेकर पेरी गांव तक सौ किलोमीटर से ज्यादा पैदल दूरी तय की। इस दौरान आधा दर्जन गांवों से होकर गुजरा। जहां इस यात्रा खासतौर पर बुग्याल संरक्षण के लिए संगठित प्रयासों का अह्वान किया। जनजागरण, रैली तथा छोटी-छोटी गोष्ठियों के साथ दल ने अभियान के दौरान निम्न प्रमुख गतिविधियां भी संचालित की।

वन, वन्यजीव एवं वनस्पतियों की स्थिति का अवलोकन
बिखरे प्लास्टिक, पौलीथीन एवं अजैविक कुड़े का संग्रह
एकत्रित प्लास्टिक तथा अजैविक कुड़ेे को कुड़ा निस्तारण केन्द्र तक प्रेषण
मिडिया के जरिये बुग्यालों के संरक्षण के जनजागरूता

नन्दादेवी राजजात यात्रा सितम्बर 2014 तक चली थी। ये इलाके छह माह तक बर्फ से ढके रहने के बाद मई-जून से फिर से खुल गए थे। जून से इस इलाके में छिटपुट मानवीय गतिविधियां शुरू हो गई थी। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार मुख्य राजजात यात्रा के बाद सुतोल से शिलासमुद्र इलाके में पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों की आवाजाही काफी सीमित रही। इस मार्ग पर अगले माह से ही पर्यटक बढ़ सकते हैं जो अक्टुबर तक चलते हैं।

सुतोल-तातड़ा गांव से भुज्याणी तक राजजात का यह मार्ग वन क्षेत्र से होकर गुजरता है। जहां कांचुला, मोरू-खरसू, कैल,थुनेर, भोज चमखड़ी, अंगा समेत अच्च हिमालयी से लगे वनों में पाये जाने वाले वहुमूल्य वन प्रजातियों की भरमार है। वही बुरांश की अनेक प्रजातियां भी इस इलाके में है। मार्ग के दोनो ओर बारिश की वजह से जंगल के बीच की खाली जगह पर घास भी तेजी से बढ़ चुकी हैं। तेजी से बढ़ने वाली तीन प्रजातियों की घास पूरे जंगली इलाके में खूब बढ़ती दिखती है। बीच-बीच में जंगली गुलाब की झाड़ियां भी तातड़ा से लेकर भुज्याणी तथा चन्दनियाघट के समीप नन्दाकिनी नदी पर बने पुल तक विस्तारित दिखी।

अभियान दल ने तातड़ा से लेकर चन्दनियांघट तक के राजजात के पैदल मार्ग तथा उसके पांच से दस किलोमीटर अगल के क्षेत्रों में गिरे पौलीथीन को एकत्रित किया। वर्षात के कारण घास बड़ी होने से इससे ज्यादा दूर का कबाड़ और प्लास्टिक आसानी से नहीं दिख रहा था जिससे प्लास्टिक पौलीथीन तथा अजैविक कबाड़ एकत्रितीकरण का कार्य मुख्य पड़ावों तथा टैक तक ही सीमित करना पड़ा। पैदल रास्ते में प्लास्टिक, पौलीथीन तथा अजैविक कुड़ा जगह-जगह पड़ा किला। खासतौर से रास्तों और उसके आसपास के इलाके में पतले पौलीथीन जमीन में जगह-जगह धंसा हुआ मिला। पतले पौलीथीन कैरी बैग तथा बरसाती के टुकड़े जो रास्तों तथा वन क्षेत्रों में जमा कम्पोस्ट के साथ मिट्टी में मिल कर जमीन में घंसते जा रहे थे। इन्हें बाहर निकालने के लिए दल के सदस्यों को सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। इस तरह की स्थिति बुग्यालो की तुलना में वनक्षेत्रों में तातड़ा से भुज्याणी के बीच ज्यादा थी। ग्रामीणों का कहना था कि राजजात यात्रा के सुतोल पहुंचने से पहले देरी की वजह से इस पूरे मार्ग में जहां भी जंगल के आसपास समतल जगह दिखी वहीं रात काटी। अपने साथ लाये खाध्य सामग्री के लिए पौलीथीन तथा अन्य रैपर व कुड़ा लापरवाही वश वहीं छोड़ दिया जिससे जंगल के बीच-बीच में इस तरह की स्थिति दिख रही है। मार्ग में जहां तक हमे दिखाई दिया इन्हें जमीन से खीच कर बाहर निकालने का प्रयास किया गया लेकिन अन्दर के इलाकों में इसकी क्या स्थिति है घास बड़ी होने से ज्यादा खोज नहीं पाये।

भोज्याणी, जामुनडाली से लेकर तातड़ा तक लगभग 15 से 20 किलोमीटर पैदल मार्ग जंगल से होकर गुजरता है। इस मार्ग पर अन्य बहुमूल्य वन सम्पदा के अलावा भोज और थुनेर के जंगल है जिनमें बहुतायत में ये बृक्ष पाये जाते हैं। भोज्याणी का अर्थ ही भोज का बड़ा जंगल है। पूरे यात्रा मार्ग पर वाण से लेकर सुतोल तक जो जगहों पर भोज्याणी है एक कैलवा विनायक के समीप निचले हिस्से में तथा दूसरी जामुनडाली और चन्दनियाघट के बीच में। कैलवाविनायक के समीप वाली भोज्याणी मुख्य पैदल मार्ग से काफी दूर है लेकिन जामुनडाली के समीप की भोज्याणी के बीचोंबीच से नन्दाराजजात यात्रा का मुख्य मार्ग गुजरता है। मार्ग गुजरने के कारण इस बार भोज पत्र के लिए भोजबृक्षों पर जबरदस्त मार पड़ी है। भुज्याणी में भोज के वृक्षों की छाल भोजपत्र के बेतरतीब तरीके से निकाली गई और इसी तरह थुनेर के पेड़ों के साथ भी हुआ। तातड़ा और लाताखोपरी पड़ाव के बीच कई स्थानों पर थुनेर के बड़े पेड़ छाल निकाले जाने की वजह से सूख कर टूट बनने की स्थिति में थे।

बुग्याली इलाकों में प्लास्टिक बिखरा होने के अलावा पूर्व में एकत्रित प्लास्टिक को जलाने तथा इसके फलस्वरूप कई स्थानों पर बुग्याली बनस्पति के पुनर्जनन में कमी भी दिखी।

बुग्यालों के संरक्षण के लिए इस इलाके में जागरूकता बढ़ी है। सुतोल वन पंचायत के सदस्यों ने बताया कि मई-जून में कीड़ाजड़ी-यारसागोम्बू के दोहन के लिए बुग्याली इलाके में जाने से पहले सभी ग्रामवाशियों को बुग्यालों को संरक्षित रखने के लिए वन पंचायत के निर्णयों की जानकारी दी जाती है। जिसमें प्लास्टिक के रैपर्स, पैकेट आदि के निस्तारण के तरीकों की जानकारी दी जाती है। इन नियमों को तोड़ने वालो को आर्थिक दण्ड देने की व्यवस्था बनायी है। दल की ओर से वन पचायत और ग्रामीणों की बैठक में प्लास्टिक-पौलिथीन के रिस्तारण के लिए इन्हें बुग्यालों में जलाने के बजाय गांव वापस लाकर निस्तारित करने का सुझाव चन्दनियाघट एवं सुतोल गांव में हुई बैठकों में दिया गया।

संसाधनों की सीमितता, प्रतिकूल मौसम के चलते दल चन्दनियाघट से ही वापस लौट आया। दल में शामिल सदस्यों ने इस स्थिति से बुग्यालों को उबारने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं जिनमें मुख्य इस प्रकार हैंः-

1. अभियान दल का मानना है कि देश के इन पवित्र एवं पारिस्थितिकीय रूप से अतिसंवेदनशील इलाकों का संरंक्षण इस इलाके की आजीविका एवं आर्थिकी से भी अभिन्न रूप से जुड़ी है। बुग्यालों तथा इन उच्च हिमालयी क्षेत्रों की सततता एवं संरक्षण से न केवल इन इलाकों के आसपास अपितु पूरे जलागम क्षेत्र की स्थिरता भी जुड़ी हुई है। बुग्यालों में तीर्थाटन एवं पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने से पहले बुग्यालों की संवेदनशीलता के बारे में स्थानीय ग्रामवाशियों पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों के जागरूकता के स्तर को बढ़ाने की जरूरत है। जिससे स्थानीय आजीविका के संसाधन बढ़ेगे और बुग्यालों की सततता तथा संबर्द्वन भी होता रहेगा।

2. बुग्याली के समीपवर्ती गांवों में जनजागरूकता बढ़ाने के कार्यक्रमों विकसित किए जाने चाहिए। बुग्यालों में होने वाले परम्परागत/ नये उत्सवों से पहले बुग्यालों की संवेदनशीलता के बारे में पैम्पलेट,पोस्टर आदि के द्वारा दुष्प्रभावों की जानकारी दी जाय तथा इन्हें रोकने के लिए जागरूक अभियान संचालित किया जाय। जिससे बुग्यालों की बनस्पति एवं वन्यजीवन को कम से कम क्षति हो।

3. बुग्यालों में भे़ड बकरियों के अलावा अन्य पालतु पशुओं के गैर परम्परागत प्रवेश को सीमित किया जाय तथा इस संबध में प्राचीन परम्पराओं का निवर्हन करने के लिए लोगों में जागरूकता लायी जानी चाहिए।

4. बुग्यालों के इन समीपवर्ती गांवों के निवासिंयों को बुग्यालों के संरक्षण तथा संबर्द्वन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए इन गांवों की स्थानीय स्वायत्त शाषी संस्थाओं यथा ग्राम पंचायत, वन पंचायत, महिला एवं युवक मंगल दलों की भूमिका को मान्यता देनी चाहिए।

5. वन पंचायतों या ईको डेबलपमेंट समितियों के जरियें पर्यटन एवं तीर्थाटन से जुड़ी गतिविधियों का नियमन करने के लिए ढंाचागत बदलाव एवं प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप करते हुए बुग्यालों के संरक्षण में इनकी जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाय तथा संसाधनों में भी इन्हें भागीदार बनाया जाय।

6. सुतोल वन पंचायत के अनुभवों को अन्य गांवों में भी बुग्याल संरक्षण कार्यक्रम के साथ साझा किया जाय।

7. इलाहबाद उच्च न्यायालय के वर्ष 1997 के बुग्यालों को बचाने के लिए दिए गए निर्देशों के अनुसार प्लास्टिक पौलीथीन एवं पर्यटन गतिविधियां रेगुलेट करने की जिम्मेदारी निगमों के बजाय स्थानीय स्वायत्त संगठनों को सौपी जाय इसके लिए यथासंभव नीतिगत बदलाव लाये जाय।

8. बुग्लालों के समीपवर्ती गांवों में इस काम में लगे संगठनों जिनमें ग्राम पंचायत, वन पंचायत, महिला एवं युवक मंगल दलों को बुग्यालों से प्लास्टिक पौलीथीन तथा अजैविक कुड़े कचरे से मुक्त रखने के लिए हर वर्ष टोकन के रूप में संसाधन उपलब्ध कराये जाय और साल में कम से कम दो बार बुग्यालों में अभियान के रूप में अजैविक कुड़े से मुक्ति के लिए अभियान संचालित किया जाय।

9. बुग्यालों की बर्बादी के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को चिन्हित कर इनके खिलाफ दण्डात्मक कार्यवाही के लिए स्थानीय वन पंचायतों को अधिकार सम्पन्न बनाया जाय।
————————
ओमप्रकाश भट्ट
प्रंबंध न्यासी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *