बुग्याल बचाओं अभियान 2016

CPBCED
Bugyal Bachao Abhiyan 2016

(सप्तकुण्ड-पुडारी, सिम्बे, सिद्विविनाक, मोरखोली, मेहरवालपाखा,भवाड़ी डोलधार बुग्याल बचाओं अभियान)

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सप्तकुण्ड के नीचे बुग्याल में जैव विविधता। 

च.प्र.भट्ट पर्यावरण एवं विकास केन्द्र की ओर से 23 जून से लेकर 26 जून 2016 तक चमोली जिले के दशोली व घाट विकासखण्ड के सुदूरवर्ती इलाके में स्थित सप्तकुण्ड टैªक पर ‘बुग्याल बचाओं अभियान’ के तहत जनजागरण एवं अजैविक कूड़े की प्रतीकात्मक रूप से सफाई की गई। 9 सदस्यीय दल में ग्रामीणों के साथ छात्रं, अध्यापकं, अधिवक्ता, पत्रकार एवं वनकर्मी  शामिल हुए।
राजकीय इण्टर कालेज निजमुला में शिक्षक तथा सामाजिक कार्यकर्ता श्री गंभीर सिंह फरस्वाण के नेतृत्व में इस अभियान दल ने हिमालय की चौदह हजार फुट की उचाई पर स्थित इलाके में पर्यावरण एवं पारिस्थितिकीय तंत्र के अध्ययन के साथ-साथ बुग्यालों में बिखरे प्लास्टिक पौलीथीन के कुड़े के एकत्रिकरण के साथ, बुग्यालों में रह रहे भेड़पालकों, कीड़ा जड़ी के संग्रहण के लिए आये ग्रामीणों के साथ बुग्यालों के संरक्षण से जुड़े विभिन्न मुद्दे पर चर्चायें की। तथा बुग्याल के संरक्षण के लिए सभी को प्रभावी भूमिका निभाने का आग्रह किया।
दल में निम्न लिखित सदस्य शामिल हुए।

  1. श्री गंभीर सिंह फरस्वाण, शिक्षक राजकीय इण्टर कालेज निजमूला।
  2. श्री भवान सिंह चौहान, पूर्व जिला पंचायत सदस्य एवं वरिष्ट अधिवक्ता जिला न्यायालय गोपेश्वर।
  3. श्री ओमप्रकाश भट्ट, आन. प्रबंध न्यासी एवं पत्रकार गोपेश्वर
  4. श्री शिवराज सिंह नेगी, वन रक्षक बदरीनाथ वन प्रभाग चमोली रेंज।
  5. श्री त्रिलोक सिंह खाती, ग्राम दुर्मि पो.ओं. गौणा जिला चमोली
  6. श्री अनूप सिंह ग्राम गाड़ी रा.ई.कालेज निजमुला।
  7. श्री अमित सिंह गड़िया रा.ई.का. निजमूला।
  8. श्री  नवीन सिंह राईका निजमूला।
  9. श्री महिपाल सिंह, भेड़पालक सिम्बैं खर्क, ग्राम रामणी जिला चमोली।
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अभियान दल के सदस्य यात्रा शुरू करते हुए। 
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झिंझी गांव में। In Jhinjhi Village.
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सिंगमे बुग्याल में मोनाल। Monal in Singmay meadow. 
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सिद्धिविनायक बुग्याल में ग्राम वासियों के साथ बुग्याल बचाने के ऊपर चर्चा ।  In siddhivinayak meadow with villagers, discussing about saving himalayan meadows.    

अभियान के लिए गोपेश्वर से पगना गांव से कुछ आगे तक जीप से यात्रा की गई तथा उसके बाद झिंझी गांव के निचले हिस्से में जंगल से पदयात्रा करते हुए झिंझी पहुंचे। तीन बजे सप्तकुण्ड के लिए रवाना हुए। फारेस्टर नेगी जी के मार्गनिर्देश पर दल ने कठिन चढ़ाई पार कर ढाणिधार में बदरीनाथ वन प्रभाग द्वारा बनाये गए पर्यटक हट में रात्रि विश्राम किया। रात्रि में दल के सदस्यों आपस में बुग्यालों तथा वनों के संरक्षण के साथ सतत पर्यटन को लेकर परिचर्चा की।
झिंझी गांव के निचले हिस्से से लेकर ढाणिधार तक का इलाका वनों से ढका है। चौड़ी पत्ती का समृद्व वन क्षेत्र इस क्षेत्र की सुन्दरता के साथ वन्यजीव और वनस्पतियों से भरा है। पक्षियों के दर्जनों प्रजातियां और हिमालय ब्लैक बियर की मौजूदगी इस इलाके में दिखी। दाणिखर्क में पानी का स्रोत है। झिंझी से दाणिखर्क के बीच की खड़ी चढ़ाई पर यही पर पानी है। वनविभाग का यह छोटा सा हट रखरखाव के अभाव में कई जगह क्षतिग्रस्त हो चुका है फिर भी इस यात्रा मार्ग पर यह अकेला आवास इस क्षेत्र में आनेजाने वालों के लिए काफी सकून और सुविधा उपलब्ध कराता है।
अभियान दल दूसरे दिन बुग्याली इलाके में पहुंचा। सप्तकुण्ड इलाके में पहुंचने से पहले पुडारी बुग्याल में पहुंचा। मीलों फैले पुडारी बुग्याल की शुरूआत नौ हजार फुट से शुरू हो गई थी। पुड़ारी बुग्याल में पहुंचते ही मोनाल के कई परिवारों 2के एक साथ दर्शन हुए। लगभग छह स्थानों पर मोनाल के नर, मादा और बच्चों के झुण्ड के झुण्ड दिखे। इस तरह की मोनाल की साईटिंग अब अन्यत्र नहीं दिखती। एक साथ छह से आठ तक मोनाल इन झुण्डों में थे। पुडारी बुग्याल में वन विभाग की सप्तकुण्ड जाने के लिए बनी पैदल बटिया के दोनो ओर बुग्याली की घास की मखमली चादर और उन पर रंगविरंगे फूलों की दूर तक फैली वाटिकायें प्रकृति की सुन्दरता के साथ इस इलाके की प्राकृतिकता को वर्णित कर रही थी। पुडारी बुग्याल की पुष्पवाटिकाओं में बारह से अधिक प्रजातियॉं की बुग्याली वनस्पतियां खिली हुई थी।
यही हाल आगे चलकर गौछल बुग्याल और सिम्बैं बुग्याल में भी दिखा। सिम्बे में भेड़पालक पहुंच गए थे। रामणी गांव के भेड़पालकों की टोली कुछ दिन पहले ही इस बुग्याल में आयी थी। सिम्बे और गौछल में खच्चर और घोड़े भी चरते दिखे। इनकी संख्या बीस के आसपास होगी। ये आसपास के गांववालों ने चराई के लिए छोड़ रखे थे। गौछल बुग्याल में आने वाले लोग गौछल गुफा को रहने के लिए प्रयोग में लाते हैं। गौछल गुफा समुद्रतल से 3839 मीटर की ऊंचाई पर है।   दूसरे दिन की यात्रा में सिम्बैं बुग्याल में रह रहे भेड़पालकों के साथ बुग्यालों के संरक्षण और समस्याओं को लेकर चर्चा करने के बाद हम सप्तकुण्ड के लिए निकले। समुद्रतल से 4052 मीटर की ऊंचाई पर जीतूकुड़ी तक बुग्याली इलाके में सीधे-सीधे ही चलते रहे। वहां से आगे खड़ी चढ़ाई और रास्ता खतरनाक था। दल के एक सदस्य का स्वास्थ्य खराब होने के कारण एक साथी के साथ बीमार सदस्य को पीछे छोड़ना पड़ा। लगभग ढाई किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई तय करने के बाद चार बजे हम लोग सप्तकुण्ड पहुंचे। यहां प्रवेश करते ही वनस्पतियां कम होने लगी थी। उच्च हिमालय में वैदरिंग की क्रिया के फलस्वरूप चट्टानों के विरूपण के अवशेष पूरे इलाके में दिखते हैं। यह इलाका नन्दाघूंघूटी पवर्त शिखर के अतिसमीप होने से ग्लेशियरों से भी भरा है। इसे इस इलाके में दैवांगणा के नाम से जाना जाता है। इस दुर्गम तथा पवित्र इलाके में सुखद स्थिति यह थी की हमें खोजने पर भी यहां पर्यटक स्थलों की तरह गंदगी नहीं मिली। एक घंटे तक हम लोग इस इलाके में रहे। सप्तकुण्ड पहुंचने के लिए वन विभाग ने जिस हिस्से में बटिया बनायी है वह नन्दाघुघूटी से सटे एक पर्वत के ग्लेशियर के निचले हिस्से से होकर जाता है। साम को गौछल गुफा के आसपास के इलाके में स्वच्छता अभियान चलाया गया। हालांकि यह भी अपेक्षाकृत प्लास्टिक एवं गन्दगी से मुक्त थी।
बीमार सदस्य की वजह से गौछल गुफा से अभियान दल दो हिस्सों में बंॉटना पड़ा। वन रक्षक नेगी जी और त्रिलोक सिंह खाती बीमार को साथ लेकर वापस झिंझी लौटे। हम लोगों ने आगे की यात्रा शुरू की। यहां से साथ में महिपाल सिंह भी दल में शामिल हुए।
सिद्विविनायक, सिम्बे बुग्याल के टाप पर है, वहां पर भी हमें घाट विकास खण्ड के आला गांव से आए जड़ी बूटी संग्रहक मिले। जिनके साथ बुग्यालों तथा इससे आसपास के लोगों को हो रहे फायदे और इसकी सततता को लेकर चर्चा हुई। आला के कीड़ा जड़ी संग्रहकों का कहना था कि हम लोग यहां आने से पहले गांव में बैठक करते हैं। बुग्यालों के संरक्षण से जुड़े पुरानी परम्पराओं और नियमों के साथ हाल की समस्याओं को लेकर बनाये गए नये कायदे व नियमों के पालन के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं। उनका कहना था कि अधिकतर लोग अब बुग्यालों में प्लास्टिक पौलीथीन फेंकने के बजाय अपने साथ वापिस ला रहे हैं। आला के मोहन सिंह का कहना था कि बुग्यालों में अब पहले जैसे वन्यजीव दिखने बंद हो गए है। कीड़ा जड़ी संग्रहण की आड़ में अवैध शिकारी भी वन क्षेत्रों में भरे हैं। इनकी रोकथाम के लिए भी प्रयास किए जाने की आवश्यकता इन लोगों ने बतायी।
सिद्वि विनायक से सीधे उतरायी में उतरना पड़ा। कोहरा घना होने से काफी कम दिखाई दे रहा था। दूर तक तीखी ढलान पर उतरने के एक घंटे बाद सूर्याघट पहुंचे यहां भेड़ बकरियों का खर्क था। इसके साथ आसपास बहुत सारे टंेट भी अलग से लगे थे। महिपाल सिंह ने जानकारी दी की ये यहां कीड़ा जड़ी और सतुआ जड़ी 3के खनन के लिए आये लोगों के टेंट हैं।  सूर्याघट से कुछ आगे फिर मोराखोली बुग्याल आया। यहां भी भेड़पालकों का आवास था साथ में ही कीड़ा जड़ी खोजने आये ग्रामीणों के टेंट भी थे। मेहरवालापाखा बुग्याल में भेड़पालकों का डेरा था। लेकिन यहां कीड़ा जड़ी और सतुआ जड़ी के खनन के लिए आये लोगों ने डेरे नहीं बनाए थे।
मेहरवाल पाखा में रामणी गांव के रणजीत सिंह नाम के भेड़पालक मिले। बचपन से भेड़ों के साथ जिंदगी बिता चुके रणजीत सिंह ने कहा कि ‘बुग्यालों में दबाव बड़ गया हैं, कीड़ा जड़ी, सतुआ जड़ी आदि के लिए मई-जून में यहां लोगों का मेला लग जाता है। घोड़े खच्चर भी पहुंचने लगे हैं। अब बुग्यालों में पहले जैसी घास नहीं रह गई है। यह सब पिछले पांच छह साल से हुआ है।’ भेड़पालकों की व्यथा सुनाते हुए रणजीत सिंह ने कहा कि ‘पिछले आठ नौ साल से कुछ लोग जबरन बकरी चुगान के लिए हमसे शुल्क ले रहे हैं जबकि इस इलाके में हम पीढ़ियों से चरान चुगान करते आये है। भेड़ चुगान का यहां हमें पुस्तैनी हक मिला हुआ है। शुल्क की कोई रशीद भी नहीं दी जाती है।’ इस जबरन वसूले जा रहे शुल्क को रोकने की मांग उन्होंने की। इस तरह की शिकायत सिम्बै बुग्याल से लेकर बालपाटा के बीच के आधा दर्जन से ज्यादा भेड़पालकों की थी। रणजीत सिंह ने बताया कि इस संबंध में जिला अधिकारी से भी निवेदन कर चुके हैं।
दोपहर तीन बजे के आसपास हम लोग डोलधार खर्क पहुंचे। यहां से बुग्याली इलाका खत्म हो जाता है और जंगल शुरू हो जाते हैं। जंगल यहीं से शुरू होता है ठीक वहां पर डोलधार खर्क हैं। घाट विकासखण्ड के घूनी गांव के परिवार अपनी मवेशियों के साथ बर्षाकाल में रहते हैं। डोलधारखर्क में रह रहे घूनी के कलमसिंह ने बताया कि कई पीढ़ियों से यहां रहते हैं छह परिवार अभी यहां हैं। यहां पहुंचने के लिए रास्ता नहीं हैं। मवेशियों के साथ यहां आने में बड़ी दिक्कत होती है। डोलधारखर्क के बाद विनायक तक इसी तरह के तीन बर्षाती खर्क इस रास्ते में पड़े जहां इन दिनों मवेशियों के साथ घूनी गांव के परिवार रह रहे थे। विनायक के पास लार्डकर्जन पैदल मार्ग मिल जाता है। इसके बाद चैचनी और धनारी खर्क में भी घूनी के परिवार अपनी मवेशियों के साथ रहते मिले। वहां से आगे रामणी तक लार्डकर्जन मार्ग बना हुआ है। रामणी से तड़ाकताल के रास्ते निजमूला के लिए निकले। इस बीच सुन्दर वन क्षेत्र से होते हुए तड़ाकताल, मनकुरा होते हुए निजमूला गांव पहुंचे। मनकुरा में दोपहर का भोजन किया और शाम को व्यारा से जीप लेकर गोपेश्वर वापस लौटे।
यात्रा के दौरान मौराखोली बुग्याल में सबसे ज्यादा प्लास्टिक पौलीथीन बिखरा पड़ा था। जिसे बोरे में भरकर नीचे लाये। बुग्याल में जहां भी लोग दिखते हम इस बोरे को दिखाते और इसी तरह अपने साथ ले जा रहे खाध्य सामग्री के रैपर को उपर छोड़ने के बजाय वापस लाने का निवेदन किया। जिसका असर भेड़पालकों पर ज्यादा दिखा।
अभियान के दौरान जो मोटी-मोटी बाते निकल कर आयी वो इस प्रकार है।

  1.  इस इलाके में वनक्षेत्र कमोवेश प्राकृतिक रूप से संरक्षित हैं।
  2. बुॅंग्यालों की स्थिति भी कमोवेश बेहतर है।
  3. बुॅंग्यालों में भू-कटाव एवं भू-धंसाव- सिम्बें बुग्याल के उपरी हिस्से में भू-धंसाव की स्थिति जबरदस्त तरीके से बढ़ती दिखी। सिम्बैं बुग्याल का उपरी हिस्सा विनायक तक चला गया है। इस उपरी हिस्से में बड़ा भू-धंसाव हो रहा है। भेड़पालकों ने बताया कि 2013 की अतिवृष्टि के बाद यह भूं-धंसाव सक्रिय हुआ है जो धीरे-धीरे बड़ा आकार ले रहा है।
  4. अवैध शिकार- कीड़ाजड़ी के लिए बुग्यालों में रह रहे अधिकतर आसपास के गांवों के ग्रामीणों ने बताया कि अब इन इलाकों में वन्यजीवों मुस्किल से दिखायी देते हैं। वन्यजीवों की संख्या पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है। इसके पीछे अवैध शिकार की शिकायत अधिकतर लोगों ने की। लोगों का कहना था कि वन्यजीवों का संरक्षण तभी हो सकता है जब इन क्षेत्रों में नियमित गस्त होती रहे।
  5. विनायक से ढोलधार के बीच के बुग्यालों के संरक्ष्ण के लिए संबंधित ग्र्रामसभाओं खासतौर पर वन पंचायतों जिन्हें पूर्व में बदरीनाथ वनप्रभाग ने कीड़ा जड़ी के विदोहन के लिए चिन्हित भी किया था जैसे बदरीनाथ वन प्रभाग की चमोली रेंज के दशोली-8 के कम्पार्टमेंट नं. 14 में गौछल गुफा के 3600 है.को वनपंचायत पाणा, पगना,ईराणी और दुर्मि के लिए चिन्हित किया था। इसी तरह इसी कम्पार्टमेंट के सिम्बैं बुग्याल के 1900 है. के इलाके के लिए घरगांव और पेरी की वन पंचायत को चिन्हित किया था। इसी कम्पार्टमेंट के पथरकुड़ी बुग्याल के 600 है. इलाके के लिए सुतोल और पेरी वन पंचायत को चिन्हित किया था तथा सप्तकुण्ड बुग्याल के 1690 है के लिए सीक, घूनी और दड़िम वन पंचायत को चिन्हित किया था।  इसी में दशोली प्रथम के कम्पार्टमेंट-3 के 2000 है. बुग्याली इलाके के लिए रामणी, आलाजोखना और बूरा वनपंचायतों को चिन्हित किया था। इन सभी के साथ मिलकर जड़ी बूटियों खासतौर पर कीड़ाजड़ी के विदोहन को रेगुलेट करने के लिए ग्रामसभाओं और वन पंचायतों को सक्रिय किए जाने की आवश्यकता है।
  6. भेड़पालकों से अवैध वसूली- सिम्बैं से लेकर ढोलधार तक एक दर्जन से अधिक भेड़पालक अपनी भेड़ों के चरान चुगान के लिए इन बुग्यालों में मिले। अधिकतर कई पीढ़ियों से इन क्षेत्रों में भेड़ों के चरान चुगान के लिए आते रहते हैं। खासतौर पर घाट और दशोली विकास खण्ड के उपरी इलाके के गांवों के भेड़पालक यहां पीढ़ियों से चरान चुगान के लिए आते हैं। इनके खर्क पहले से ही निश्चित है। यही ये बर्षाकाल के तीन से चार महीने चरान चुगान करते है। पूरे रास्ते में भेड़पालकों की शिकायत थी की कुछ साल से उनसे अवैध रूप से कुछ ग्रामीण चरान चुगान के नाम पर वसूली कर रहे हैैं। जिसकी शिकायत इस साल जिला अधिकारी और वनअधिकारी से भी की है लेकिन वसूली थमी नहीं है। भेड़पालकों से अवैध रूप से वसूले जा रहे शुल्क की शिकायत की जांच की जानी चाहिए तथा यदि इस तरह की कोई वसूली हो रही है तो इसे बुॅंग्यालों के संरक्षण से जोड़ा जाना चाहिए। जिससे भेड़पालक पहले की तरह बुॅंग्यालों के संरक्षण में परम्परागत भागीदारी निभाते रहे।
  7. भेड़पालकों को ईको-टूरिज्म से जोड़ने के कार्यक्रम में शामिल किया जाय। इन्हें इसके लिए प्रशिक्षण तथा आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराये जाय। प्रशिक्षण में बुग्यालों तथा स्थानीय पारिस्थितिकीय तंत्र की जानकारी के साथ हौस्पटिलिटी और संसाधन में पर्यटकों को सुविधा देने के लिए टेंट,स्लीपिग बैग और रसोई के किट शामिल हो। इससे जहां भेड़पालकों  की आय में इजाफा होगा वहीं इस दूरस्थ इलाके में पर्यटन से बुग्यालों को कम से कम नुकसान हो इसकी भी निगरानी हो सकेगी और पर्यटकों को आसानी से सुविधा भी मिल सकेगी। इन दोनों की सकारात्मक भूमिका का लाभ संरक्षण में मिल सकेगा।

ओमप्रकाश भट्ट  प्रबंध न्यासी, सीपीबी पर्यावरण एवं विकास केन्द्र,  गोपेश्वर।

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