लेाकप्रिय पर्यावरण व्याख्यान माला श्रंखला के तहत तीसरा
पर्यावरण व्याख्यान स्व. श्री चिरंजी लाल जी की स्मृति में आयोजित किया जाता है।
स्व. श्री चिरंजी लाल भट्ट जी का संक्षिप्त जीवन परिचय एवं कार्य विवरण
स्व. चिरंजी लाल भट्ट का जन्म गोपेश्वर गांव के एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। पिता स्व. तुलाराम भट्ट भारतीय सर्वेक्षण विभाग में अधिकारी के पद थे। पिता के सेवाकाल के दौरान ही उनका जन्म 27 अक्टूबर 1921 को मसूरी में हुआ था। सामुहिक कार्य का पाठ बचपन में पिता से ही मिला। इनके पिता तुलाराम भट्ट ने अपने धन से गांव में शादी व्याह के काम आने वाली सामग्री का संग्रह कर सामुहिक और बड़े आयोजनों के लिए जरूरी चीजों की चिन्ता से अपने ग्रामवाशियों को उस दौर में लगभग मुक्ति दिला दी। बड़े-बड़े गेढ़े, कड़ाइयां और चावल पकाने के बर्तनों के साथ दरियों आदि का संग्रह किया। जब भी गांव में या आसपास के इलाके में शादी व्याह या सामुहिक भोज के आयोजन होते थे तो वे उदारतापूर्वक लोगों की जरूरतों को पूरा किया करते थे। निशुल्क उपलब्ध कराते थे। कई दशकों तक पूरे इलाके के लोग इस सेवा का लाभ उठाते रहे। बचपन की पिता की यह सीख स्व. चिरंजी लाल जी के लिए समाजसेवा का पहला पाठ बनी। अभावों और विपत्तियों के बाद भी वे इस धर्म को निभाते में कभी पीछे नहीं रहे।
सन 1955-56 में बदरीनाथ मन्दिर समिति में स्वयंसेवक के रूप में कार्य करते हुए इनके इन गुणों में निखार आया। गरीब, असहाय एवं बीमार यात्रियों की सेवा में वे बढ़-चढ़ भाग लेते थे। इस सेवाभाव को जयप्रकाश नारायण जी के बदरीनाथ आगमन के बाद एक नयी दिशा मिली। सन 1956 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी बदरीनाथ की यात्रा पर आये। पीपलकोटी में जयप्रकाश नारायण जी का व्याख्यान से प्रभावित होकर बदरीनाथ तक उनकी यात्रा में शामिल रहे। उसके बाद वे सर्वाेदय आंदोलन के अंग बन गए। मृत्युपरन्त इससे जुड़े रहे।
उन्होंने भूदान-ग्रामदान के लिए चमोली जिले के अलावा उत्तराखण्ड की दर्जनों यात्राओं में भाग लेकर लोक-जागरण की शृंखला संचालित की। वे मल्ला नागपुर सहकारी श्रम संविदा समिति के संस्थापक सदस्य थे। दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल तथा उत्तरप्रदेश गांधी स्मारक निधि से भी जुड़े रहे। वर्षों तक सर्वोदय मण्डल के अध्यक्ष रहे।
उत्तराखण्ड में सन 1999 में चन्द्रापुरी से आरम्भ हुए शराबबंदी आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही तथा 1971 तक उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में चले शराबबंदी सक्रिय भूमिका निभायी जिसके फलस्वरूप पूरे उत्त्राखण्ड में दो दशक तक शराबबंदी रही।
वनआंदोलन-चिपको आंदोलन के प्रारम्भ में वे जिला सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष थे। उनकी पहल पर वनोें को बचाने के लिए जगह-जगह रैलियॉं और सभाएॅं हुई थीं।
स्व. चिरंजीलाल भट्ट ने एक और जीवन मंत्र दिया था कि आदमी की करनी और कथनी में कोई भेद नहीं होना चाहिए। वे आदमी को धरती पर ईश्वर का सबसे अमूल्य उपहार मानते हुए कहते थे कि यदि व्यक्ति अथवा समाज के कारण किसी व्यक्ति का मन टूट जाता है तो ईश्वर बहुत रोता है।
वनों के अधिकारों की लड़ाई, चिपकों आंदोलन या बदरीनाथ की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का सवाल हो, हर बिन्दु पर उन्होंने रचनात्मक विरोध कर उत्तराखण्ड में एक नया जीवन जीया। मध्यनिषेध के पूरे भारत में अलख जगाने वाले स्व. भट्ट की मृत्यु 1 जनवरी 1976 को हुई। मृत्यु के चार दिन पहले भी वे उत्तराखण्ड मद्यनिषेघ की यात्रा कर वापस लौटे थे।
सर्वोदयी जीवन और जयप्रकाश नारायण के विचारों से ओतप्रोत होकर समाज सुधार के लिए जीवन समर्पित कर दिया। इस पूरे इलाके में आज भी यदि किसी बुजूर्ग और सामाजिक संचेतना के प्रति जागृत व्यक्ति से स्व. भट्ट के बारे में पूछा जाय तो उनका यही उत्तर रहता है कि ‘‘ कंधे पर झोला लटकाये, ऑंखांे पर मोटा चश्मा, दरमियानी कद और खादी वस्त्र धारण किए चिरंजीलाल भट्ट समाज को जागृत करने के लिए हमेशा कभी भी, कहीं भी दिख सकते थे।’’
जीवन को एक उपासक की तरह जीने वाले स्व. चिरंजीलाल भट्ट ऐसा व्यक्तित्वः था, जिन्होंने जीवन के आखिरी क्षण तक दरिद्र नारायण अर्थात आखिरी और उपेक्षित व्यक्ति तथा समाज को उसके अधिकार एवं सम्मान के लिए जिया, उस समय जब समाज जातिवादी तथा अन्य सामाजिक विषमताओं के कारण अपने मूल स्वरूप से पृथक् हो रहा था। तब स्व. चिरंजी लाल भट्ट सामाजिक न्याय के लिए अपने घर से शुरुआत कर दिशा बोधक का काम किया।
गांधी के अछूतोद्वार आंदोलन, मद्यनिषेध तथा ग्रामोत्थान को जीवन मंत्र स्वीकारने वाले स्व. चिरंजी लाल भट्ट का जन्म भले ही ब्राह्मण जाति में हुआ था, मगर उन्होंने जब जीवन का होश संभाला तो देखा कि जाति वादी खेमों में बॅंटे समाज ने ईश्वर की सबसे सुखद रचना व्यक्ति को अछूत मानकर उसके प्रति घृणा का भाव पाला है। उसके साथ आत्मीय व्यवहार नहीं किया जा रहा है। स्वयं उस अछूत व्यक्ति को नारायण का अवतार तथा उसके घरों को ईश्वर का घर मान कर स्व. भट्ट ने आचार्य विनोबा भावे से दीक्षा लेकर जीवन पर्यनत सर्वोदय विचार धारा को जिया, ग्राम दान, घर-घर में सर्वोदयी विचार को पहुंचाया। समाज में सबके साथ बराबरी का भाव रखना। मेहनत से अर्जित धन से जीवन-यापन करना। गॉंव के झगड़े गांव में निबटाने, मद्यनिषेध तथा सर्व-धर्म को समता के भाव से देखना स्व. भट्ट ने अपना जीवन संकल्प बनाया था। वाणी, भेष तथा कर्म से सर्वोदयी विचारधारा के इस मनीषी ने व्यक्तिगत जीवन भले ही घोर आर्थिक विपदा में जीया मगर अपनी आर्थिक विपदा को कभी भी अपनी जीवन यात्रा के मध्य आड़्े नहीं आने दिया।
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