आलमसिंह बिष्ट लेाकप्रिय पर्यावरण व्याख्यान माला तथा जीवन परिचय
लेाकप्रिय पर्यावरण व्याख्यान माला के क्रम में हर साल यह दूसरा व्याख्यान
आलमसिंह बिष्ट जी की स्मृति में किया जाता है। समाजसुधार और चिपकों आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले स्व. श्री आलम सिंह बिष्ट जी के कार्यो और स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए केन्द्र की ओर से यह व्याख्यान आयोजित किया जाता है।
स्व. श्री आलम सिंह बिष्ट जी का संक्षिप्त जीवन परिचय एवं कार्य विवरण
चमोली जिले की मंडल घाटी के खल्ला गॉंव के सामान्य परिवार में जन्मे आलम सिंह बिष्ट ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत ग्रामीण जीवन की समस्याओं और संघर्ष को मुखर करने के साथ की। वे जीवनभर जनसरोकारों से जुड़े मसलों को लेकर संघर्षरत रहे। चिपको आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका हो या सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण के मसले हो, हर क्षेत्र में स्व.बिष्ट जी का अविस्मरणीय योगदान रहा है। पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ जीवनभर लड़ते रहे।
सामाजिक कार्य को अपना जीवन मिशन बनाने वाले श्री आलम सिंह बिष्ट जी का जन्म मंडल घाटी के खल्ला गांॅव में 27 अगस्त 1923 को हुआ था। बचपन से ही सामाजिक कार्यो में रुचि तथा निडरता ने इनकी अलग पहचान बनी। जन-समस्याओं को सलीके से रखना और सच्ची बात के लिए बड़़े-से बड़े अधिकारी से भी निडरता से भिड़ना और अपनी बात मनवाने के लिए अंत तक अडिग रहने जैसे गुणों के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।
गांधी जी के ग्राम स्वराज्य की कल्पना को साकार करने के लक्ष्य के साथ वे आचार्य विनोवा भावे के विचारों को लेकर ग्रामीण जीवन में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हुए। गांधी जी के चरखा आंदोलन को अपने जीवन से जोड़ा। मंडल घाटी में चरखा उद्योग की स्थापना की, कई लोगों को इससे जोड़ा। इस तरह ग्राम स्वराज्य की मुहिम को आगे बढ़ाते चले गए। इनके नेतृत्व में पहली ‘‘भूदान यज्ञ यात्रा’’ जनवरी 1959 में शुरू हुई। मल्लानागपुर के गॉंव-गॉंव तक इस यात्रा के जरिये भूदान का संदेश पहुंॅचा। इस यात्रा में इनके साथ श्री चिरंजी लाल भट्ट, महन्त अनुसूया प्रसाद एवं श्री चण्डीप्रसाद भट्ट भी थे। इनकी इस पहल से दूरदराज के गॉंवों में लोक जागरण की नींव पड़ी। इस यात्रा के तत्काल बाद पहला सर्वोदय सम्मेलन 30 जनवरी 1959 को गोपेश्वर में सम्पन्न हुआ।
स्व.आलम ंिसह बिष्ट जी कई सालों तक जिला भूदान यज्ञ समिति के संयोजक भी रहे। 1962 और 1965 के युद्व में शहीद सैनिकों के परिवारों की सुध लेने के लिए श्री चण्डी प्रसाद भट्ट जी को साथ लेकर मल्ला दशोली एवं नन्दाक के गांॅवों की लम्बी पैदल यात्रा की, बड़ी संख्या में शहीद विधवाओं की समस्याओं को कम करने के प्रयास किए। उस दौर में अपनी तरह का यह पहला संवेदनशील प्रयास था।
वे चिपको आंदोलन की मातृ संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल के संस्थापक सदस्यों में एक थे। चिपको आंदोलन में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा। मंडल घाटी के वनों में साइमन कंपनी की घुसपैठ के चलते वे दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल के चंडी प्रसाद भट्रट के साथ जुड़ कर चिपको आंदोलन की मुहिम में डट गए। जब पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्रट मंडल घाटी के वनों के निर्मम दोहन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे तो तब मंडल में आलम सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में ही स्थानीय ग्रामीणों की बैठक में इस घाटी के वनों के कटान को रोकने के लिए जोरदार अभियान छेड़ने का संकल्प जताया गया। 24 अप्रैल 1973 को मंडल में चिपकों आंदोलन की पहली रैली की अध्यक्षता के साथ वनों के संरक्षण के लिए सतत संघर्षशील रहे । वे लम्बे समय तक चिपको आंदोलन की निगरानी समिति के संयोजक रहे।
शिक्षा को भी सामाजिक विकास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानने वाले स्व. बिष्ट ने शिक्षाविहीन इलाके में शैक्षणिक संस्थाओं के गठन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। शैक्षणिक संस्थाओं के अभाव के दौर में इन्होंने पूरे इलाके के लोगों को संगठित कर विद्यालयों और शिक्षा संस्थानों की स्थापना की महत्त्वपूर्ण पहल की और इस कार्य को दिशा दी। अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लोकपुरुषार्थ से गोपेश्वर में निजी इण्टर कालेज खुलवाया। इस विद्यालय को संचालित करने में वे भी आगे रहे और इसके प्रबंधकीय दायित्व के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के प्रयासों में भी जुटे रहे। मौजूदा श्री 1008 गीता स्वामी राजकीय इंटर कालेज गोपेश्वर इनके भी योगदान का उदाहरण है।
वे ग्राम संगठनों के सशक्तीकरण के भी जबरदस्त हिमायती थे। ग्राम संगठनों की मजबूती को ग्राम विकास का मूल मंत्र मानते थे। इसे साकार करने के लिए उन्होंने खुद भी पहल की। वे अपनी ग्राम पंचायत में दो बार ग्राम सभा के प्रधान पद पर रह कर कई नवीन गतिविधियों को अमली जामा पहनाया।
वे अस्पृश्यता को समाज के लिए सबसे घातक बुराइयों में एक मानते थे और जीवनभर इसे मिटाने के लिए संकल्परत रहे। इसके लिए इन्होंने कई व्यावहारिक कार्यक्रम उस दौर में संचालित किए जब इस चीज को खुले रूप में कहने की हिम्मत जुटाना ही बड़ी चुनौती थी। इन्होंने इसके लिए व्यवस्थित कार्ययोजना के तहत कार्य किया। अपने गांॅव में ही अस्पृश्यता निवारण कार्यक्रम के जरिये अनुसचित जाति के लोगों के साथ सामूहिक भोजन की परम्परा शुरू की। यहां तक कि उस दौर में अपने इलाके में ही उन्हें प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ा था।
इलाके के विकास में भी इनका जबरदस्त योगदान रहा। मंडल-घाटी में शिक्षण संस्थानों की मांग से जुडे संघर्ष हो या वन्य जीव संरक्षण के लिए कांचुला खर्क में कस्तूरा मृग प्रजनन केन्द की स्थापना या फिर उत्तराखण्ड जड़ी बूटी शोध संस्थान का सृजन, इन सबमें स्व.श्री आलम सिंह बिष्ट जी अगुवा बने रहे।
अपने जीवन के अन्तिम दशक में उन्होंने पत्रकारिता को भी अपने संघर्ष के हथियार के रूप में चुना। 80 के दशक में ‘उत्तरी ध्रुव’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन कर उन्होंने जन सरोकारों से जुड़े मसलों को लेकर अपनी कलम से जनता की बखूबी सेवा की।
राज्य सरकार ने श्री बिष्ट जी की इस लगन को देखते हुए उन्हें श्री बदरीनाथ केदारनाथ मन्दिर समिति का सदस्य मनोनीत किया। जहॉं पॉंच साल तक मन्दिर के प्रशासन को दिशा देने में इनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।
कहना न होगा कि जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में विकास की अवधारणा को साकार करने और विकास प्रक्रिया का लाभ अंतिम छोर तक के लोगों को दिलाने के लिए छिडे़ तमाम आंदोलनों में वे स्वतः ही कूद जाते थे। आम जनता के प्रति समर्पण उनके जीवन संघर्ष का हिस्सा बन गया था। जन सेवा करते – करते 23 दिसंबर 1988 को एक लंबी बीमारी के पश्चात् उन्होंने अंतिम सांॅस ली। सामाजिक जीवन में विपरीत परिस्थितियों के बीच विभिन्न जन सरोकारों से जुड़े मसलों में शामिल रहने के कारण उन्हें आज भी बड़ी श्रद्धा से याद किया जाता है। मौजूदा दौर में जब सामाजिक सेवा का अभिप्राय लगातार समाप्त होता जा रहा है तो नई पीढ़ी के लोगों को पुरानी पीढ़ी के समाजसेवियों से बड़ी सीख लेने की भी जरूरत है।
- आलम सिंह बिष्ट जी के बारे में श्री राजपाल सिंह बिष्ट के लेख पर आधारित
