वनाग्नि की रोकथाम के लिए लोकप्रयास’

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‘वनाग्नि की रोकथाम के लिए लोकप्रयास’ विषय पर 2 जून 2016 को ग्वालदम के एस.एस.बी. सभागार में आयोजित गोष्ठी की कार्यवाही विवरण एवं इसके निष्कर्ष।

आयोजक
च.प्र.भ. पर्यावरण एवं विकास केन्द्र गोपेश्वर
एवं
जागो हिमालय लोक कल्याण समिति थराली
सहयोग
एस.एस.बी.अकादमी,ग्वालदम एव ग्रीन,क्लिीन ग्वालदम अभियान

 

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अपनी बात रखते

‘वनाग्नि की रोकथाम के लिए लोकप्रयास’ विषय पर 2 जून 2016 को ग्वालदम के एस.एस.बी. सभागार में आयोजित गोष्ठी की कार्यवाही विवरण एवं इसके निष्कर्ष।

दिनांक 2/6/2016 को विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में सीपीबी पर्यावण एवं विकास केन्द्र गोपेश्वर एवं जागो हिमालय लोक कल्याण समिति थराली की ओर से एस.एस.बी. अकादमी के सभागार में पर्यावरण गोष्ठी आयोजित की गई। दो सत्रों में यह कार्यक्रम चला। पहले सत्र में ‘वनाग्नि की रोकथाम के लिए लोकप्रयास’ विषय को लेकर चर्चा हुई। दूसरे सत्र में सीपीबी पर्यावरण एवं विकास केन्द्र द्वारा प्रायोजित स्व. श्री केदार सिंह रावत स्मृति पर्यावरण पुरुस्कार उत्तराखण्ड के प्रख्यात पत्रकार, समाजसेवी एवं पर्यावरणविद् श्री रमेश पहाड़ी को दिया गया।

गोष्ठी की अध्यक्षता एस.एस.बी. अकादमी के उप महानिरीक्षक श्री सोमित जोशी ने की तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के गोविन्द बल्लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं सतत विकास राष्टीय ªसंस्थान कटारमल-अल्मोड़ा के निदेशक व प्रख्यात पर्यावरण विज्ञानी डा. पी.पी. ध्यानी ने किया। इस मौके पर तलवाड़ी महाविद्यालय के प्राचार्य डा. महेश चन्द्र नैनवाल, सर्वोदयी कार्यकर्ता श्री मुरारीलाल, जिला पंचायत थराली वार्ड की सदस्या श्रीमती भावना रावत, ग्वालदम की ग्राम प्रधान श्रीमती मीनू टमट्टा, श्री रमेश पहाड़ी एवं आई.टी.बी.पी. के पूर्व महानिरीक्षक श्री हीरासिंह पंचपाल जी विशिष्ठ अतिथि के रुप में कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। कार्यक्रम में गढ़वाल व कुमाऊं के एक दर्जन से अधिक गांवों के लोगों ने भागीदारी की जिसमें महिलायें ज्यादा थी। एस.एस.बी.ग्वादम,बदरीनाथ वन प्रभाग, राजकीय महाविद्यालय तलवाड़ी, कृषि विज्ञान केन्द्र ग्वालदम के साथ इस कार्यक्रम में एक दर्जन से ज्यादा स्वयंसेवी संगठनों के अनुभवी कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही जिसमें मुख्य रूप से सृजन समिति कूनीगाढ़,हिलांश विकास समिति बैनोली, कोशिस तलवाड़ी,संकल्प समिति भंेंटा,पौराणिक संरक्षण अभियान ग्वालदम, ग्रीन ग्वालदम,क्लीन ग्वालदम अभियान, प्रेस क्लब थराली, बधाणी संस्कृतिक समिति सूना,भुवनेश्वरी महिला आश्रम गैरसैंण, हाईप्रेक श्रीनगर, वृक्षमित्र अभियान, अतिथि शिक्षक संगठन, महिला मंगल दल ग्वालदम, बधाणगढ़ी स्वायत सहकारिता फेडरेशन, व्यापार मंडल ग्वालदम, एवं ग्राम पंचायत ग्वालदम मुख्य रुप से सम्मिलित हुए। संचालन सीपीबी पर्यावरण एवं विकास केन्द्र के कोषाध्यक्ष मंगला कोठियाल ने किया। शुभारम्भ दीप प्रज्वलन से हुआ।

पत्रकार एवं जागो हिमालय लोक कल्याण समिति के मुख्यकार्यकारी श्री रमेश थपलियाल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मैती आंदोलन और ग्रीन एवं क्लीन ग्वालदम आंदोलन की इस धरती से आग से जंगलों की सुरक्षा को लेकर अयोजित इस गोष्ठी को ग्वालदम की इस पहल का एक रुप बताते हुए कहा कि आग से वन एवं पर्यावरण को हुए नुकसान और उसके निराकरण के लिए चिन्तन व कार्यक्रम बनाने के लिए यहां पर अपने अनुभवों और विचारों को साझा करने के लिए धन्यवाद दिया।

सीपीबीसीईडी प्रबंध न्यासी श्री ओमप्रकाश भट्ट ने कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम वन्यजीव अपराधों के पूरी तरह रोकने के बारे में है लेकिन हमने वनाग्नि को लेकर यह गोष्ठी आयोजित की है। वनाग्नि आज उत्तराखण्ड में वन,वनस्पति,वन्यजीवन एवं पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है। इस साल चार हजार हैक्टयर से ज्यादा वनक्षेत्र आग की भेंट चढ़े हैं। जंगलों में आग लगने से जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है वहीं लोकजीवन पर भी इसका जबरदस्त दुष्प्रभाव पड़ता है। उन्होंने आग लगने के कारणों, इसके प्रभावों को विस्तार से जानकारी दी और कहा कि दावाग्नि का जैसा जंगल पर प्रभाव पड़ता है उसी तरह इससे सबसे ज्यादा नुकसान इन जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों पर पड़ता है। उनकी आजीविका प्रभावित होती है। भूक्षरण बढ़ता है इससे खेत, मकान और मार्ग भी नष्ट हो जाते हैं। खेती की उर्वरता कम हो जाती है। जंगल का पारिस्थितिकीय संतुलन गड़बड़ा जाता है। इसका भी सीधा और पहला प्रभावी गांवों के लोगों पर पड़ता है। जहां लोगों में जागरूकता है वहां जंगल में आग कम लगती है। पहले की तरह लोग जंगल की आग बुझाने के लिए आगे आये इसके लिए हमें खुद ही प्रयास करने होगे। हमें उन कारणों का तलाशना होगा जिससे लोग अब दावाग्नि के मामले में तटस्थ हो रहे है। इस गोष्ठी में इन कारणों की पहचान करने के साथ इनके निवारण के लिए किस तरह के उपाय हो सकते हैं। किस स्तर पर इन उपायों को लागू किया जाना चाहिए इस पर चिन्तन हो और निष्कर्ष के रूप में एक व्यावहारिक कार्यक्रम बन सके तो आज हम लोगों का ग्वालदम में इस हाल में आना सार्थक होगा।

पर्यावरणविद् एवं सर्वोदयी कार्यकर्ता श्री मुरारी लाल जी ने स्वरचित नारों से अपनी बात रखी। उन्होंने नारा दिया,‘ लगाना है तो बाग लगाओं, जलाना है तो दिया जलाओं।’ समेत वन संरक्षण से जुड़े स्लोगन लगा कर कार्यक्रम में शामिल लोगों को जागृत किया। उन्होंने अपने गांव में बंजर पड़े इलाके को संरक्षित वन में बदलने की कहानी बताते हुए कहा कि पिछले तीन दशकों में कई जंगल आग से खाक हुए लेकिन हमारे गांव के ये संरक्षित इलाके वनाग्नि के मामले में अत्याधिक संवेदनशील होने के बाद भी कभी नहीं जले। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब बताते हुए मुरारीलाल ने कहा कि इस जंगल को बनाने, इसकों सुरक्षा देने और इसके उपयोग में पूरे गांव के लोग जुड़े थे उनकी संवेदनायें और फायदे इसमें जुड़े थे। आग न लगने के पीछे यही वजह थी। चार दशक पहले चमोली जिले के मुख्यालय के निचले हिस्से में स्थित हमारे गांव का यह इलाका पूरी तरह बंजर था। लोग अपनी जंगल से जुड़ी जरूरतों खासतौर पर जलावन और घास के लिए गांव से तीस से चालीस किलोमीटर दूर जाते थे। बंजर इलाके की सुरक्षा ने पहले साल ही गांव के लोगों की बीस से तीस फीसदी इन जरूरतों को पूरा किया। जिससे लोगों में उत्साह बना। स्वयं नियम बनाये और उनका पालन किया। संरक्षण के लिए हर परिवार ने नियमित शुल्क दिया। इसका फल एक के बाद एक तीन इलाके संरक्षित हुए और आज भी इसी तरह संरक्षित एवं विकसित हो रहे हैं। आग की रोकथाम में गांव के लोग न केवल महत्वपूर्ण अपितु बड़ी भूमिका निभाते हैं जरूरत है जंगल से उन्हें जोड़ने की। और इसके लिए उनके परम्परागत अधिकारों के साथ परम्परागत जिम्मेदारी देने के लिए माहौल बनाने की जरूरत है। तभी जंगल भी बचेगे और लोग सुखी और सुरक्षित रहेगें।

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प्रतिभागीगण

थराली के पूर्व प्रमुख एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुशील रावत अकेला ने कहा कि वनाग्नि से वनो के आसपास के लोग ही सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। आग के धुंए के कारण लोगों का जीना मुहाल हो गया था। वनों की आग के लिए बिजली की लाइनों से निकलने वाली चिंगारी भी बड़ा कारण है। उन्होंने कहा कि चीड़ के पेड़ों का कटान खुले इसके लिए चीड़ वनों को सुनियोजित तरीके से जबरन जलाया गया। दावाग्नि के बहाने चीड़ के वनों के काटने के प्रयास की घोर भर्त्सना करते हुए श्री रावत ने कहा कि हमें चीड़ के इस दुगर्ण का उपयोग अपनी आजीविका को बेहतर बनाने के लिए करना चाहिए न कि आग के बहाने इन जंगलों की सफाये की योजना बनाने में अपना समय बर्बाद करना चाहिए।

बदरीनाथ वन प्रभाग के ग्वालदम के रजि अधिकारी श्री गोपाल सिंह बिष्ट ने वनाग्नि के दुष्प्रभावों की विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि इससे जंगल और इलाके की जैवविविधता को भारी नुकसान पहुंचता है। आग की रोकथाम के लिए सभी को आगे आना चाहिए। लोगों को ऐसी कोई गलती नहीं करनी चाहिए जिससे जंगलों में आग फैले। आग फेलने के कारणों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हम अपने छोटे-छोटे स्वार्थो के लिए जंगल में आग लगाते हैं। जिसका भारी नुकसान जंगल और हमे ही होता है। इसके लिए जागरूकता की जरूरत पर जोर दिया।

देवाल के डा. हेम मिश्रा ने कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन और संस्कृति जंगलों के संरक्षण के विचार से ओतप्रोत है। हमें इन विचारों को फिर से अपनाना होगा। इसी में वन और पर्यावरण के संरक्षण का विचार निहित है इस भावना को जीवन में उतारने से निश्चित ही पर्यावरण संरक्षण के साथ दावाग्नि की घटनायें थमेगी। अगस्त्यमुनी से आये पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री अनुसूया प्रसाद मलासी ने नयी पीढ़ी को वन संरक्षण से जोड़ने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता बताई। जिससे बचपन से इनके खतरों से होने वाले नुकसान को समझने व उसके लिए प्रयास करने की भावना बढ़ेगी जिससे जंगल जलने की घटनाओं में कमी आ सकेगी।

थराली वार्ड की जिला पंचायत सदस्या श्रीमती भावना रावत, महिला मंगल दल ग्वालदम की अध्यक्षा श्रीमती सुषमा खम्पा ने पर्यावरण को समग्रता से समझने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि जंगल की आग और पर्यावरण को संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। हम सबको मिलकर इन मसलों के निराकरण के लिए आगे आना होगा। संगठित प्रयासों से ही ये मसले हल होंगे।

वृक्षमित्र शिक्षक डा. त्रिलोक चन्द्र सोनी ने कहा कि आग लगाने के लिए बहुत सारे आरोप लगाये जाते हैं। गांववालों को आग लगाने का दोषी ठहराया जाता है। लेकिन हमारा सवाल है केवल आरोप मड़े जाते हैं। यदि ये सही होते तो इन लोगों को पकड़ा क्यो नहीं जाता है? उन्होंने कहा यदि यह सही भी मान लिया जाय-जबकि सही नहीं है तो फिर हम उन कारणों की तह में क्यों नहीं जाते हैं? क्यो आग लगा रहे हैं? आज जरूरत लोगों को जंगलों से जोड़ने की है। जंगल लोगों के लिए पहले जैसे ही उपयोगी वने। उनके रोजगार के स्रोत बने तो निश्चित ही जंगल आग से सुरक्षित रहेगे। इसके लिए जंगलों में फलपट्टी विकसित होनी चाहिए। उन्होंने वृक्षमित्र अभियान के बारे में भी जानकारी दी और कहा कि हर कार्य में हमें पेड़ लगाना होगा और धरती के हरित आवरण बढ़ाने के लिए कार्य करना होगा। उनका कहना था कि जंगल में कौन आग लगा रहा है इसके लिए जंगलों में ओटोमैटिक कैमरे लगाये जाने चाहिए।

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गोष्ठी में शामिल प्रतिभागी अपनी बात रखते हुए

राजकीय महाविद्यालय तलवाड़ी के प्राचार्य डा. महेश चन्द्र नैनवाल ने वनाग्नि की रोकथाम में जनसहभागिता को सबसे जरूरी कदम बताया और कहा कि गांववालों की भागीदारी के बिना आग से जंगल बचाने की बात बेमानी है। उन्होंने इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के कई रचनात्मक सुझाव दिए। कृषि विज्ञान केन्द्र ग्वालदम की प्रभारी वैज्ञानिक श्रीमती उमा नोलिया तथा ग्वालदम के सामाजिक कार्यकर्ता हीरा सिंह बडियारी ने परम्परागत लोकज्ञान में छिपे संरक्षण की जानकारी देते हुए कहा कि हमारे पूर्वज किसी वैज्ञानिक से कम नहीं थे। जंगल की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की तकनीकों को जानते थे। वनाग्नि की रोकथाम के लोक में मौजूद परम्पराओं का अध्ययन कर इन्हें उपयोगी बनाया जा सकता है। आई टी बी पी के पूर्व महानिरीक्षक श्री हीरा सिंह पंचपाल अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि हमें पर्यावरण चिन्तन की चर्चा करने से पहले अपने आसपास के पारिस्थितिकीय तंत्र को समझना होगा। ग्वालदम के पारिस्थितिकीय तंत्र का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बचपन में ग्वालदम में कई झीलें और तालाब थे जो एक-एक कर खत्म हो गए है। तालों की वजह से जंगलों में नमी रहती थी और वनाग्नि की घटनायें भी कम होती थी। तालाब खत्म हो गए हैं, दावाग्नि से यहां के जंगल भी अछूते नहीं हैं। जंगल में तालाब बने इससे जंगल का पर्यावरण संरक्षित होगा और आग लगने पर निकट से पानी भी उपलब्ध होगा।

गोष्ठी के मुख्य अतिथि गोविन्द बल्लभ पंत हिमायलन पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान के निदेशक डा.पी.पी.ध्यानी ने बचपन से ही वनों से जुड़ने के अपने जीवन के अनुभवों को साझा किया और बताया कि कैसे उनके मन में पेड़़ पौधे और पर्यावरण संरक्षण की अलख जली। उनका कहना था कि जनता के सहयोग से ही वनाग्नि को काबू किया जा सकता है। उन्होंने अपने संस्थान द्वारा वनाग्नि को लेकर किए गए अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि 99 प्रतिशत दावाग्नि की घटना मानवजनित पायी गई है। इसमें 63 प्रतिशत जानबूझकर लगाने की थी। दुर्घटनावश जंगल जलने का प्रतिशत 37 था। डा. ध्यानी जी ने वनाग्नि के दुष्प्रभाओं का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि चीड़ को वनाग्नि में खलनायक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। उसके विनाशकारी प्रभावों की तो चर्चा की जा रही है लेकिन उसके वरदान साबित होने के स्वरूप को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि चीड़ वन यूरोप के सबसे महव्पूर्ण वन है। ये वहां रोजगार और आयवर्द्वन के सबसे बड़े स्रोतों में एक है। यूरोप में चीड़ की नीडल का तेल निकाला जाता है। इससे बचे नीडल की रूई बनायी जाती है जो काफी लोकप्रिय और महंगी है। हमारे यहां भी चीड़ के इस तरह के उपयोग को बढ़ावा देने की बात होनी चाहिए। जिससे रोजगार भी मिलेगा और चीड़वनों में आग भी नहीं लगेगी। उन्होंने चीड़ के वनों को अभिशाप न मानकर इनका समुचित उपयोग मानव हित में करने पर जोर दिया और यूरोप में इस दिशा में चल रहे कार्यो की विस्तार से जानकारी भी दी।

केदारसिंह स्मृति पर्यावरण पुरुस्कार से सम्मानित पर्यावरणविद् श्री रमेश पहाड़ी ने जंगल की आग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पर कई बार विचार किया गया है। बेहतर सुझाव भी आये हैं लेकिन जब क्रियान्वयन की बात आती है तो पूरी प्रक्रिया थम सी जाती है। जंगल क्यों जल रहे हैं? यह एक सवाल है, इसके कई पहलू है इन पर चिन्तन किया जाना चाहिए। उन्होंने दावाग्नि से जुड़े आंकड़ों की प्रमाणिकता पर सवाल खडे करते हुए कहा समस्या के समाधान की तह तक जाने के लिए हमे दावाग्नि की घटनाओं को समग्रता से देखना होगा। घटनाओं के कारणों व सही आंकड़ों का विश्लेषण होना जरूरी है, ताकि आगे इनका नीतिगत मामलों में उपयोग हो। उन्होंने कहा कि जंगल जल रहे हैं, क्यों जल रहे है? इन सवालों को लेकर व्यवहारिक शोधकार्य होना चाहिए। लोग जंगलों को आग से बचाने के लिए पहले जैसी सक्रियता क्यो नहीं दिखा रहे हैं। सवाल उठाया कि लोग अपने घरों, खेत, बाग-बगीचों को आग से बचाते हैं लेकिन जंगलों को नहीं बचा पा रहे हैं, इसके लिए आखरी कौन जिम्मेदार है? इसके लिए हमारी वन से जुड़ी नीतियों में खामियां है जिन्हें समझना होगा। इसलिए आग, जंगल और पानी के संबंधों को लोक से जोड़ना होगा। समन्वित प्रयासों से ही इस पर काबू पाया जा सकता है। आवश्यकता यह समझने की है कि लोग क्यो नही शामिल हो रहे है और कैसे फिर से शामिल हो? इन पहलुओं के समाधान से ही हम दावाग्नि की रोकथाम की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

अंत में अध्यक्षीय संबोधन में एस.एस.बी ग्वालदम के उप महानिरीक्षक सोमित जोशी ने कहा कि आग की रोकथाम सभी के सहयोग से ही हो सकता है। उन्होंने कहा कि हर काम सरकार करेगी या हर काम जनता करेगी, इसमें सामजस्य बिठाना जरूरी है। उन्होंने दावाग्नि की रोकथाम में लोकभागीदारी के लिए लोकजागरूकता के साथ-साथ इससे लोगों के हितों को जोड़ना होगा। उन्होंने इस साल की दावाग्नि की घटना से हुये पर्यावरणीय नुकसान को गंभीर बताया और कहा कि इसके दुष्प्रभावों को कम करने के लिए हमें मिलकर रचनात्मक प्रयास करने होंगे। इसमें सबको अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी। सरकार और ग्रामीण मिलकर प्रयास करे तो निश्चित ही वनाग्नि को काबू में रखा जा सकता है।

 

समयाअभाव के कारण जो वक्ता गोष्ठी में अपने विचार नहीं रख पाये थे अलग से अपने सुझाव दिए।

मुख्य रूप से जो सुझाव निकल कर आये है वे संक्षेप में इस प्रकार हैं।

  • दावाग्नि के लिए गांव की सहभागिता बहुत जरूरी है। सरकारी तंत्र और ग्रामीणों के बीच वनाग्नि की रोकथाम के लिए सामंजस्य बने इसके लिए गांव स्तर पर दावाग्नि सुरक्षा कमेठी का गठन किया जाय। इसमें गांव की महिला मंगल दल,युवक मंगल दल, वन पंचायत, ग्राम पंचायत के पदाधिकारी, गांव के स्वयं सहायता समूहों के पदाधिकारी एवं वनविभाग के कर्मचारी सदस्य के रुप में रहे। ग्राम स्तरीय जो भी कर्मचारी है वे भी इसमें सक्रिय रुप से भागीदारी करने तथ्ज्ञा यह प्रोटोकोल के अंतरगत हो जंगल में आग लगने पर समिति स्वयं सक्रिय हो। समिति की अध्यक्ष महिला हो जो महिला मंगल दल की अध्यक्षा या वन पंचायत की सरपंच में से कोई हो। यह समिति हर साल अक्टूबर माह में अपने गांव के समीपवर्ती वनक्षेत्रों की अग्नि सुरक्षा की योजना बनाये तथा अग्निकाल शुरू होने पर इस योजना का क्रियान्वयन स्वयं करे। कमेटी को सक्रिय करने की जिम्मेदारी उस क्षेत्र के टेरिटोरियल वन प्रभाग की हो। वन विभाग इस तरह की कमेठी वनपंचायत या महिला मंगल दल के सहयोग से गठित कर सकता है। ये समिति तहसील एवं जिलास्तर की कमेठियों के सीधे सम्पर्क में हो।
  • गांव की दावाग्नि सुरक्षा कमेठी की सलाह पर गांव के लोगो को वनाग्नि की रोकथाम के लिए प्रशिक्षित किया जाय।
  • अग्निकाल से पूर्व असुरक्षित एवं संवेदनशील वन क्षेत्रों तथा दावाग्नि के संभावित कारणों की पहचान हो तथा इनके निवारण के उपयों को समय पर लागू किया जाय। खासतौर पर सड़कों एवं पैदल बटियाओं की देखभाल के पूर्व में रखे जानी वाली गैंग व्यवस्था को पुर्नजीवित किया जाय जिससे सड़कों से जंगल में फैलने वाली आग को कम किया जाय।
  • गांव की वुनियादी सुविधाओं यथाः सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य तथा आजीविका से जुड़ी योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए वन संरक्षण अधिनियम के तहत भूमि हस्तांतरण की अनुमति को बिलम्बित रखे रहने की प्रवृत्ति को कम करने के प्रयास किए जाय।
  • वन्य जीव संरक्षण, वन संरक्षण, भारतीय वन अधिनियम तथा वृक्ष संरक्षण अधिनियम के लोकोपयोगी प्रावधानों एवं नियमों को लागू करने में हीला-हलाली की प्रवृत्ति रूके।
  • वनों में आग की रोकथाम के लिए परम्परागत फायर लाईनों की प्राविधियों को पूर्व की भांती लागू किया जाय। इसका व्यापक प्रचार प्रसार हो,इसके उपयोग की जानकारी भी वनों के आसपास के लोगों के साथ सांझा की जाय।
  • दावाग्नि की रोकथाम के लिए आग-पतरौल की पूरानी व्यवस्था को पूर्ववत रखने के साथ इसे समय पर लागू करना और पंचायती वनों में इसी तरह की आग-पतरौल की व्यवस्था के लिए संसाधन मुहैया कराये जाय।
  • लोगों और जंगलों के बीच रिश्ता मजबूत करने के लिए गांव के लोगों को वन संपदा के उपयोग और संरक्षण से जुड़े हक-हकूकों को प्रदान करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनायी जाय और इनका उपयोग गांव का हर व्यक्ति सहजता से कर सके इसके लिए कारगर योजना बनायी जाय।
  • अग्निकाल से पहले संवेदनशील इलाको से सूखी पत्तियों के निस्तारण किया जाय।इनका उपयोग आजीविका सुधार में हो इसके लिए इनके वैकल्पिक उपयोग की प्राविधियों से जरूरतमंद लोगों को प्रशिक्षित करने तथा संसाधन उपलब्ध कराये जाय।
  • दावाग्नि की सही रिपोर्टिग हो इसक ेलिए प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की तैनाती की जाय।
  • दावाग्नि पर जमीनी स्तर पर शोध कार्य हो, इसके परिणामों का प्रसार आम जन के बीच हो ताकि दावाग्नि की रोकथाम तथा बचाव की भावी योजनाओं में इन अनुभवों को शामिल किया जाय।
  • वनाग्नि की रोकथाम में सक्रिय रहने वाले ग्रामस्तरीय संगठन की पहचान का तंत्र विकसित किया जाय। इन्हें सार्वजनिक रूप से रेंज या प्रभागीय स्तर पर पुरुस्कृत करने के कार्यक्रम बनाये जाय ताकि इनके कार्यो से अन्य गांवों के लोग भी प्रेरित हो।
  • बार-बार दावाग्नि की चपेट में आने वाले वन क्षेत्रों के अधिकारधारकों को अग्निकांड पर सामूहिक दण्ड से रोकथाम व्यवस्था को कुछ इलाकों में प्रयोग के लिए लागू किया जाना चाहिए ताकि दण्ड और प्रोत्साहन के नियमों के आधार पर वनाग्नि की रोकथाम के प्रयोग का अनुभव हो और सामुहिक जिम्मेदारी की भावना विकसित हो।
  • वृक्षारोपण वाले क्षेंत्रों के अग्निकांड की थर्ड पार्टी जांच की अनिवार्य व्यवस्था लागू की जाय।
  • चीड़ वनों में जिस तरह से आग फैल रही है इसके पीछे कोई सुनियोजित एवं संगठित तंत्र तो काम नहीं कर रहा है इन आशंकाओं की निष्पक्ष जांच की व्यवस्था के लिए कुछ इलाकों में इस तरह की आग लगने की घटनाओं की वैज्ञानिक विधियों से जांच करायी जाय।
  • यूरोप की तरह उत्तराखण्ड में भी चीड़ के वन लोगों के लिए वरदान बने, इसके लिए यूरोप की तर्ज पर उत्तराखण्ड के चीड़ वनों के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए व्यावहारिक कार्यक्रम बनाये जाय।
  • विना तथ्यों के किसी समुदाय या लोक को आग लगाने के जिम्मेदार ठहराने के बजाय, तथ्यात्मक रुप से आग लगाने तथा फैलाने के लिए जिम्मेदार लोगों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही अमल में लायी जाय, जिससे आग लगाने के जो लोग जिम्मेदार हैं उन पर अंकुश लगे। संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके लिए निगरानी तंत्र मजबूत किया जाय।
  • आग बुझाते समय दुर्घटना का शिकार होने वाले ग्रामवाशियों या स्वयंसेवी बचाव दल के सदस्यों को सरकारी कर्मचारियों की भांती मुवावजा एवं सहायता देने के प्रावधान बनाये जाय।
  • वन क्षेत्र में नमी संरक्षण के परम्परागत उपायों को पुर्नजीवित किया जाय। वन क्षेत्र के परम्परागत तालाबों के पुर्नउöार के साथ नयी चाल-खाल बनायी जाय।

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  • ओमप्रकाश भट्ट
    प्रबंध न्यासीसी.पी.बी. पर्यावरण एवं विकास केन्द्र गोपेश्वर

    मो.न. 9411368874

  • रमेश थपलियाल
    मुख्य कार्यकारी
    जागो हिमालय लोक कल्याण समिति
    थराली जिला चमोली उत्तराखण्ड।
    मोबा.9412947977

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